कैसे करें मां नर्मदा की परिक्रमा – अच्युतानंद सरस्वती
नर्मदे हर!
नर्मदा परिक्रमा हमें क्या सिख देती है? जीवन के कुछ अनुपम सबक सिखाती है कुछ नियम भी होते हैं। उसी क्षण से जब परिक्रमा का संकल्प लेते हैं।
१) परिक्रमा का संकल्प देते समय श्वेत वस्त्र परिधान करने को कहा जाता है, श्वेत रंग शांती का प्रतीक तो है ही यह हमारे मानस पर ज्ञान व वैराग्य की भावना को जगाता है, हम ज्ञान पिपासु होने लगते है सारे सुख सुविधा ऐश्वर्य को छोड कर मैया की शरण में आते हैं।
२) मैया मे डुबकी लगाने व साबुन इत्यादी का प्रयोग करने की मनाही, हमें जलप्रदूषण को रोकने की सिख देती है।
३) विभिन्न आश्रम में हमें जो सामने आता है भोजन प्रसाद के रूप में उसे ग्रहण करना होता है, अपनी इच्छा रूची को त्याग कर इससे हमें परिस्थिती अनुसार जीवन यापन की सिख मिलती है।
४) जब हम चलते हैं तो अकेले ही चलने के लिये कहा जाता है, पर अक्सर लोग समुह में चलते हैं, ऐसा होने पर व्यर्थ चर्चा ज्यादा करते हैं, अकेले चलने से हम अंतर्मन का आकलन करते हैं आत्मचिंतन करते हैं। आत्मचिंतन ही हमे बोध कराता है “कोहम” का मै कौन हुं मेरा जन्म क्यों हुआ है हम अपने द्वारा किये गये कर्म का विवेचन करतें हैं, तब ज्ञात होता है हमारे द्वारा क्या पाप कायिक वाचिक मानसिक हुए हैं, परिक्रमा का मंत्र ही है, “यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।”
उनके नाश की कामना परिक्रमा के एक एक पद को चलते हुऐ नष्ट हो जायें, इस भावना के साथ परिक्रमा करें। अतः साथ मे रिश्तेदार मित्र कोई भी हो कम से कम सोलह कदम का अंतर रखना अपेक्षित होता है।
५) दंड आपके हाथ में ब्रम्हदंड का प्रतीक होता है क्योंकी आप ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं व्रतस्थ होते हैं ब्रम्हदंड की पूजा उसे खडा रखकर की जाती है आडा दंड बांबू का तो अर्थी का होता है अतः पूजा के समय दंड को दिवार के सहारे खडा रखें, पूजाअर्चा आरती दिपक कभी भी आप जिस आसन पर सोते हैं उसपर ना करें, आश्रमों मे हीटलॉन की गादी होती है जो की पूजन के लिये निषिद्ध होती है।
६) आपको निर्देश दिया जाता है मार्ग मे फुल पत्ते ना तोडे केवल चंदन, हलदी, कुमकुम अक्षत से ही पूजन करें, ऐसा करके अनायास ही आपके उपर से एक ऋण उतर जाता है। जन्मतः हम सभी पर ऋण होते हैं, (१) मातृ ऋण (२) पितृऋण (३) देव ऋण (४) ऋषी ऋण (५) भु ऋण (७) राष्ट्र ऋण। भु ऋण इस भुमि का हम पर ऋण है हमारे पैरों के आघात अपने मर्म पर सहती है, हमारे मलमुत्र तक को धारण करती है इतना होने पर भी कभी हम पर उलटकर हमारा मलमुत्र नहीं फैंकती अपितु हमें अपने गर्भ से उत्तम अन्नधान्य मधुर फल देती है इतना ही नहीं हमारे दैनंदिन जीवन के व्यवहार हेतु बहुमुल्य खनिज, धातु व रत्न भी देती है। भु माता से बढकर कोई और सहनशीलता की मिसाल हो ही नहीं सकता। भु ऋण चुकाने के लिये इसके पारिस्थितीक संतुलन को बनाये रखना परम आवश्यक है, गोवर्धन पर्वत उठाकर योगेश्वर श्री कृष्ण ने हमें यही तो सिखाया है प्रकृती (निसर्ग) हमारी देवता है, फुल आदी ना तोडकर अनजाने में आप नववृक्ष सृजन मे योगदान देते हैं, फुल ना तोडने से फल लगते है फलों में स्थित बिज से नये वृक्ष पौधे साकार होते हैं। ऐसा करने से भुऋण चुक जाता है।
७) चलते समय कयी जगह चढाई आती है, पिठ पर बोझ होता है चढते समय आगे झुक जाते हैं, यह है जीवन की सफलता की कुंजी, जीवन मे जो नम्र होता है वह निरंतर प्रगती करते हुऐ अपने केरियर में बुलंदी को छुता है, जो घमंड मे अकडता है वो गिर जाता है, ऊंचाई पर चढ नहीं पाता।
८) शुलपाणी में एक समय ऐसा भी आता है जहाँ स्नान के लिये भी जल नहीं मिलता है पिने के लिये बिल्कुल नाममात्र का ऐसा ही लक्कड कोट में भी होता है जहाँ पेयजल नहीं मिल पाता है, स्नान से बाह्य रूप से तो व्यक्ती स्वच्छ हो जाता है पर क्या अंतर्मन और भाव शुद्ध होते हैं।
माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा, गंगा में डुबकी लगाने से क्या सच में धुलते हैं पाप?
*भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥
भावार्थ:-श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥
गंगा स्नान से पापों का नाश होना बतलाया गया है, परंतु नित्य गंगा स्नान करने वाले लोग भी पाप में प्रवृत्त होते देखे जाते हैं।
एक समय शिव जी महाराज पार्वती के साथ हरिद्वार में घूम रहे थे। पार्वती जी ने देखा कि सहस्त्रों मनुष्य गंगा में नहा-नहाकर ‘हर-हर’ कहते चले जा रहे हैं परंतु प्राय: सभी दुखी और पाप परायण हैं। पार्वती जी ने बड़े आश्चर्य से शिव जी से पूछा कि ‘हे देव ! गंगा में इतनी बार स्नान करने पर भी इनके पाप और दुखों का नाश क्यों नहीं हुआ? क्या गंगा में सामर्थ्य नहीं रही?’
शिवजी ने कहा ‘प्रिये! गंगा में तो वही सामर्थ्य है, परंतु इन लोगों ने पापनाशिनी गंगा में स्नान ही नहीं किया है तब इन्हें लाभ कैसे हो?’’
पार्वती जी ने आश्चर्य से कहा कि”स्नान कैसे नहीं किया? सभी तो नहा-नहा कर आ रहे हैं? अभी तक इनके शरीर भी नहीं सूखे हैं।’
शिवजी ने कहा,’ये केवल जल में डुबकी लगाकर आ रहे हैं। तुम्हें कल इसका रहस्य समझाऊंगा।’
दूसरे दिन बड़े जोर की बरसात होने लगी। गलियां कीचड़ से भर गईं। एक चौड़े रास्ते में एक गहरा गड्ढा था, चारों ओर लपटीला कीचड़ भर रहा था। शिवजी ने लीला से ही वृद्ध रूप धारण कर लिया और दीन-विवश की तरह गड्ढे में जाकर ऐसे पड़ गए, जैसे कोई मनुष्य चलता-चलता गड्ढे में गिर पड़ा हो और निकलने की चेष्टा करने पर भी न निकल पा रहा हो।
पार्वती जी को उन्होंने यह समझाकर गड्ढे के पास बैठा दिया कि ‘देखो, तुम लोगों को सुना-सुनाकर यूं पुकारती रहो कि मेरे वृद्ध पति अकस्मात गड्ढे में गिर पड़े हैं कोई पुण्यात्मा इन्हें निकालकर इनके प्राण बचाए और मुझ असहाय की सहायता करे।
शिवजी ने यह और समझा दिया कि जब कोई गड्ढे में से मुझे निकालने को तैयार हो तब इतना और कह देना कि ‘भाई, मेरे पति सर्वथा निष्पाप हैं इन्हें वही छुए जो स्वयं निष्पाप हो यदि आप निष्पाप हैं तो इनके हाथ लगाइए नहीं तो हाथ लगाते ही आप भस्म हो जाएंगे।’
पार्वती जी ‘तथास्तु’ कह कर गड्ढे के किनारे बैठ गईं और आने-जाने वालों को सुना-सुनाकर शिवजी की सिखाई हुई बात कहने लगीं। गंगा में नहाकर लोगों के दल के दल आ रहे हैं। सुंदर युवती को यूं बैठी देख कर कइयों के मन में पाप आया, कई लोक लज्जा से डरे तो कइयों को कुछ धर्म का भय हुआ, कई कानून से डरे।
कुछ लोगों ने तो पार्वती जी को यह भी सुना दिया कि मरने दे बुड्ढे को क्यों उसके लिए रोती है? आगे और कुछ दयालु सच्चरित्र पुरुष थे, उन्होंने करुणावश हो युवती के पति को निकालना चाहा परंतु पार्वती के वचन सुनकर वे भी रुक गए। उन्होंने सोचा कि हम गंगा में नहाकर आए हैं तो क्या हुआ, पापी तो हैं ही, कहीं होम करते हाथ न जल जाएं।
बूढ़े को निकालने जाकर इस स्त्री के कथनानुसार हम स्वयं भस्म न हो जाएं। किसी का साहस नहीं हुआ। सैंकड़ों आए, सैंकड़ों ने पूछा और चले गए। संध्या हो चली। शिवजी ने कहा, ‘पार्वती! देखा, आया कोई गंगा में नहाने वाला?’
थोड़ी देर बाद एक जवान हाथ में लोटा लिए हर-हर करता हुआ निकला, पार्वती ने उसे भी वही बात कही। युवक का हृदय करूणा से भर आया। उसने शिवजी को निकालने की तैयारी की। पार्वती ने रोक कर कहा कि ‘भाई यदि तुम सर्वथा निष्पाप नहीं होओगे तो मेरे पति को छूते ही जल जाओगे।’
उसने उसी समय बिना किसी संकोच के दृढ़ निश्चय के साथ पार्वती से कहा कि ‘माता! मेरे निष्पाप होने में तुझे संदेह क्यों होता है? देखती नहीं मैं अभी गंगा नहाकर आया हूं। भला, गंगा में गोता लगाने के बाद भी कभी पाप रहते हैं? तेरे पति को निकालता हूं।’
युवक ने लपककर बूढ़े को ऊपर उठा लिया। शिव-पार्वती ने उसे अधिकारी समझकर अपना असली स्वरूप प्रकट कर उसे दर्शन देकर कृतार्थ किया। शिवजी ने पार्वती से कहा कि ‘इतने लोगों में से इस एक ने ही गंगा स्नान किया है।’
इसी दृष्टांत के अनुसार जो लोग बिना श्रद्धा और विश्वास के केवल दंभ के लिए गंगा स्नान करते हैं उन्हें वास्तविक फल नहीं मिलता परंतु इसका यह मतलब नहीं कि गंगा स्नान व्यर्थ जाता है। विश्वास के साथ किए गए गंगा स्नान का मिलता है वास्तविक फल।
विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥
भावार्थ:-मैं आपसे भली-भाँति निश्चित किया हुआ सिद्धांत कहता हूँ- मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्री हरि का भजन करते हैं, वे अत्यंत दुस्तर संसार सागर को (सहज ही) पार कर जाते हैं॥
तो बाह्य शुचिर्भूत होने से कुछ नहीं होता भावशुद्धी मनशुद्धी होना आवश्यक है।
क्रमशः…
पोस्ट बहुत बडी हो गई है शेष अगले भाग में
©महंत श्री श्री १०८ अच्युतानंद सरस्वती
योगी आखाडा, जिलाध्यक्ष नंदुरबार
श्री शंकर नर्मदा आश्रम, धनाजे खुर्द
तालुका धडगाव जिला नंदुरबार महाराष्ट्र-